श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.30.14 
तस्मिन् यद्यसमाप्ते च जप्यहोमे विभावसौ।
युध्येयं देव संग्रामे तदा मे स्याद् विनाशनम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं युद्ध के उद्देश्य से किए गए जप और होम को पूरा किए बिना समरांगण में युद्ध आरम्भ करूँ, तो ही मेरा नाश हो जाएगा ॥14॥
 
If I start fighting in Samarangana without completing the chanting and homa done for the purpose of war, then only I will be destroyed. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)