श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 3: राक्षस वंश का वर्णन - हेति, विद्युत्केश और सुकेश की उत्पत्ति  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  7.3.20-21h 
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्याम: सर्व एव यथागतम्॥ २०॥
कृतकृत्या वयं तात दत्वा तव वरद्वयम्।
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय! तुम्हारा कल्याण हो। अब हम सब जिस रास्ते से आए थे, उसी रास्ते से लौटेंगे। तुम्हें ये दो वरदान देकर हम अपने को धन्य मानते हैं।"
 
‘My dear! May you be blessed. Now we will all return the same way we came. We consider ourselves blessed by giving you these two boons.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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