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ramayan 7.29.37: तुम बलपूर्वक अपने शत्रु को पकड़कर इच्छानुसार तीनों लोकों का राज्य भोग सकते हो। यहाँ अपना श्रम व्यर्थ करने से क्या लाभ? अब युद्ध करने से कोई लाभ नहीं है॥37॥   |   ramayan सर्ग 7.29: रावण का देवसेना के बीच से होकर निकलना, देवताओं का उसे कैद करने के लिये प्रयत्न, मेघनाद का माया द्वारा इन्द्र को बन्दी बनाना तथा विजयी होकर सेना सहित लङ्का को लौटना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 29: रावण का देवसेना के बीच से होकर निकलना, देवताओं का उसे कैद करने के लिये प्रयत्न, मेघनाद का माया द्वारा इन्द्र को बन्दी बनाना तथा विजयी होकर सेना सहित लङ्का को लौटना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  7.29.37 
यथेष्टं भुङ्क्ष्व लोकांस्त्रीन् निगृह्यारातिमोजसा।
वृथा किं ते श्रमेणेह युद्धमद्य तु निष्फलम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
तुम बलपूर्वक अपने शत्रु को पकड़कर इच्छानुसार तीनों लोकों का राज्य भोग सकते हो। यहाँ अपना श्रम व्यर्थ करने से क्या लाभ? अब युद्ध करने से कोई लाभ नहीं है॥37॥
 
‘You can capture your enemy by force and enjoy the kingdom of the three worlds as per your wish. What is the use of wasting your labour here? Now there is no use in fighting.’॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)