श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 28: मेघनाद और जयन्त का युद्ध, पुलोमा का जयन्त को अन्यत्र ले जाना, देवराज इन्द्र का युद्ध भूमि में पदार्पण, रुद्रों तथा मरुद्गणों द्वारा राक्षस सेना का संहार और इन्द्र तथा रावण का युद्ध  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  7.28.40-41 
रथान् नागान् खरानुष्ट्रान् पन्नगांस्तुरगांस्तथा।
शिशुमारान् वराहांश्च पिशाचवदनानपि॥ ४०॥
तान् समालिङ्गॺ बाहुभ्यां विष्टब्धा: केचिदुत्थिता:।
देवैस्तु शस्त्रसंभिन्ना मम्रिरे च निशाचरा:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
कुछ राक्षस रथ, हाथी, गधे, ऊँट, सर्प, घोड़े, शिशुमार, सूअर और पिशाचों के मुख वाले वाहनों को दोनों भुजाओं से पकड़कर अचेत हो गए थे। बहुत से जो पहले से ही अचेत पड़े थे, वे होश में आकर उठ खड़े हुए, किन्तु देवताओं के अस्त्रों से टुकड़े-टुकड़े होकर मृत्यु के मुख में चले गए ॥40-41॥
 
Some demons had become motionless, clinging to chariots, elephants, donkeys, camels, snakes, horses, Shishu-maaras, boars and vehicles with the faces of vampires, by holding them with both arms. Many who were already lying unconscious, got up after regaining consciousness, but were torn to pieces by the weapons of the gods and went into the jaws of death. ॥40-41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)