श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 27: सेना सहित रावण का इन्द्रलोक पर आक्रमण, इन्द्र की भगवान् विष्णु से सहायता के लिये प्रार्थना, भविष्य में रावण वध की प्रतिज्ञा करके विष्णु का इन्द्र को लौटाना, देवताओं और राक्षसों का युद्ध तथा वसु के द्वारा सुमाली का वध  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  7.27.42-43h 
ते महाबाणवर्षैश्च शूलप्रासै: सुदारुणै:॥ ४२॥
हन्यमाना: सुरा: सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहता:।
 
 
अनुवाद
उसके महान् बाणों, भयंकर भालों और बाणों की वर्षा से पीड़ित होकर समस्त देवता युद्धभूमि में एकमत होकर खड़े नहीं रह सके ॥42 1/2॥
 
All the gods could not remain standing united on the battlefield as they were being smitten by his great arrows, terrible spears and a shower of arrows. ॥ 42 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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