श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 27: सेना सहित रावण का इन्द्रलोक पर आक्रमण, इन्द्र की भगवान् विष्णु से सहायता के लिये प्रार्थना, भविष्य में रावण वध की प्रतिज्ञा करके विष्णु का इन्द्र को लौटाना, देवताओं और राक्षसों का युद्ध तथा वसु के द्वारा सुमाली का वध  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.27.15 
न तावदेष दुष्टात्मा शक्यो जेतुं सुरासुरै:।
हन्तुं चापि समासाद्य वरदानेन दुर्जय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘पहली बात तो यह है कि इस दुष्टात्मा रावण को समस्त देवता और राक्षस मिलकर भी नहीं मार सकते, क्योंकि वरदान के कारण वह इस समय अजेय हो गया है।॥15॥
 
‘The first thing is that this evil soul Ravana cannot be killed or defeated by all the gods and demons combined together, because due to the boon he has become invincible at this time.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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