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ramayan 7.25.6: (मेघनाद यज्ञ के नियमानुसार चुप रहा) उस समय यज्ञ सम्पत्ति की समृद्धि के लिए वहाँ आये हुए महातपस्वी पुरोहित द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्य ने राक्षसमुख रावण से कहा- ॥6॥   |   ramayan सर्ग 7.25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.25.6 
उशना त्वब्रवीत् तत्र यज्ञसम्पत्समृद्धये।
रावणं राक्षसश्रेष्ठं द्विजश्रेष्ठो महातपा:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
(मेघनाद यज्ञ के नियमानुसार चुप रहा) उस समय यज्ञ सम्पत्ति की समृद्धि के लिए वहाँ आये हुए महातपस्वी पुरोहित द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्य ने राक्षसमुख रावण से कहा- ॥6॥
 
(Meghnad remained silent as per the rules of Yagya) At that time, the great ascetic priest Dwijashrestha Shukracharya, who had come there for the prosperity of the Yagya property, said to the demon-headed Ravana - 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)