श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.25.18 
ईदृशैस्त्वं समाचारैर्यशोऽर्थकुलनाशनै:।
धर्षणं प्राणिनां ज्ञात्वा स्वमतेन विचेष्टसे॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! ये आचरण यश, धन और कुल का नाश करते हैं। इनसे प्राणियों को जो कष्ट होता है, वह महान पाप है। यह जानते हुए भी आप नीति का उल्लंघन कर रहे हैं और मनमाना आचरण कर रहे हैं॥ 18॥
 
‘O King! These practices destroy fame, wealth and family. The suffering caused to living beings by these is a great sin. Even after knowing this, you are violating the moral conduct and indulging in arbitrariness.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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