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ramayan 7.24.17-18h: अहा! इस पुरुषलोक को धिक्कार है! इससे अधिक नीच कोई लोक नहीं है; क्योंकि यहाँ इस बलवान रावण ने हमारे दुर्बल पतियों को उसी प्रकार नष्ट कर दिया है, जैसे सूर्यदेव उदय होते ही तारों को अदृश्य कर देते हैं॥17 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.24: रावण द्वारा अपहृत हुई देवता आदि की कन्याओं और स्त्रियों का विलाप एवं शाप, रावण का रोती हुई शूर्पणखा को आश्वासन देना और उसे खर के साथ दण्डकारण्य में भेजना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 24: रावण द्वारा अपहृत हुई देवता आदि की कन्याओं और स्त्रियों का विलाप एवं शाप, रावण का रोती हुई शूर्पणखा को आश्वासन देना और उसे खर के साथ दण्डकारण्य में भेजना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.24.17-18h 
अहो धिङ्मानुषं लोकं नास्ति खल्वधम: पर:।
यद् दुर्बला बलवता भर्तारो रावणेन न:॥ १७॥
सूर्येणोदयता काले नक्षत्राणीव नाशिता:।
 
 
अनुवाद
अहा! इस पुरुषलोक को धिक्कार है! इससे अधिक नीच कोई लोक नहीं है; क्योंकि यहाँ इस बलवान रावण ने हमारे दुर्बल पतियों को उसी प्रकार नष्ट कर दिया है, जैसे सूर्यदेव उदय होते ही तारों को अदृश्य कर देते हैं॥17 1/2॥
 
Oh! Shame on this world of men! There cannot be any world more wretched than this; for here this powerful Ravan has destroyed our weak husbands in the same manner as the Sun God makes the stars invisible as soon as he rises.॥ 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)