श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 22: यमराज और रावण का युद्ध, यम का रावण के वध के लिये उठाये हुए कालदण्ड को ब्रह्माजी के कहने से लौटा लेना, विजयी रावण का यमलोक से प्रस्थान  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.22.31 
बलं मम न खल्वेतन्मर्यादैषा निसर्गत:।
स दृष्टो न मया काल मुहूर्तमपि जीवति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
‘काल! यदि मैं उस पर दृष्टि डालूँ, तो वह रावण दो क्षण भी जीवित न रह सकेगा। मेरे ऐसा कहने का उद्देश्य केवल अपनी शक्ति प्रदर्शित करना नहीं है; अपितु यह तो स्वाभाविक नियम है।’॥31॥
 
‘Kaal! If I cast my sight on him, that Ravan will not be able to live even for two moments. The purpose of my saying this is not merely to display my power; rather, this is the natural rule.’॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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