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श्लोक  7.21.40 
तत: स कार्मुकी बाणी समरे चाभिवर्धत।
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन क्रुद्धस्तस्थौ यथान्तक:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ कुछ क्षण बाद वह पुनः अपने संयम में आ गया। फिर हाथ में धनुष-बाण लेकर, बड़े उत्साह के साथ, वह युद्धभूमि में क्रोधित यमराज की भाँति खड़ा हो गया।
 
There he regained his composure after a few moments. Then with his bow and arrow in his hand and with great enthusiasm he stood in the battlefield like an enraged Yamaraja.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)