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ramayan 7.20.17-18h: नारदजी की यह बात सुनकर लंकापति रावण ने अपने तेज से उत्साहित उन ऋषियों को प्रणाम करके मुस्कुराकर कहा - ॥17 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.20: नारदजी का रावण को समझाना, उनके कहने से रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषयमें विचार करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 20: नारदजी का रावण को समझाना, उनके कहने से रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषयमें विचार करना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.20.17-18h 
एवमुक्तस्तु लङ्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा॥ १७॥
अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च।
 
 
अनुवाद
नारदजी की यह बात सुनकर लंकापति रावण ने अपने तेज से उत्साहित उन ऋषियों को प्रणाम करके मुस्कुराकर कहा - ॥17 1/2॥
 
On hearing Narada say this, Ravana, the king of Lanka, bowing to those sages who were excited by his brilliance, smilingly said - ॥17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)