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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 20: नारदजी का रावण को समझाना, उनके कहने से रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषयमें विचार करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.20.1 
ततो वित्रासयन् मर्त्यान् पृथिव्यां राक्षसाधिप:।
आससाद घने तस्मिन् नारदं मुनिपुङ्गवम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
(अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन!) इसके बाद राक्षसराज रावण पृथ्वी पर मनुष्यों को आतंकित करता हुआ विचरण करने लगा। एक दिन पुष्पक विमान से यात्रा करते हुए बादलों के बीच उसकी भेंट नारदजी से हुई। 1॥
 
(Agastyaji says - Raghunandan!) After this, the demon king Ravana started roaming on the earth terrorizing humans. One day, while traveling by Pushpak aircraft, he met the sage Naradji amidst the clouds. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)