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श्लोक  7.2.15-16 
न चापश्यच्च सा तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम्॥ १५॥
तस्मन् काले महातेजा: प्राजापत्यो महानृषि:।
स्वाध्यायमकरोत् तत्र तपसा भावित: स्वयम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'उसने अपनी किसी सहेली को वहाँ आते नहीं देखा। उस समय प्रजापति के पुत्र महर्षि पुलस्त्य अपनी तपस्या से प्रकाशित होकर वहाँ वेदों का अध्ययन कर रहे थे।
 
‘She did not see any of her friends coming there. At that time the great sage Pulastya, son of Prajapati, illuminated by his penance, was studying the Vedas there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)