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श्लोक 7.19.28  |
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं प्राणपरिक्षये।
नह्यहं विमुखी रक्षो युद्धॺमानस्त्वया हत:॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| मेरे प्राण जा रहे हैं, अतः इस समय मैं क्या कर सकता हूँ? हे रात्रि-राक्षस! मुझे संतोष है कि मैंने युद्ध से मुँह नहीं मोड़ा। मैं युद्ध करते हुए तुम्हारे द्वारा मारा गया हूँ॥ 28॥ |
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| ‘My life is going away, so what can I do at this time? O night-demon! I am satisfied that I did not turn my back on the battle. I have been killed by you while fighting.॥ 28॥ |
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