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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 19: रावण के द्वारा अनरण्य का वध तथा उनके द्वारा उसे शाप की प्राप्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.19.21 
तस्य बाणा: पतन्तस्ते चक्रिरे न क्षतं क्वचित्।
वारिधारा इवाभ्रेभ्य: पतन्त्यो गिरिमूर्धनि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
किन्तु जिस प्रकार पर्वत शिखर पर बादलों से गिरती जलधाराएँ उसे कोई हानि नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे गिरते हुए बाण उस रात्रि प्राणी के शरीर के किसी अंग को क्षति नहीं पहुँचा सके।
 
But just as the streams of water falling from the clouds on the mountain peak do not harm it, similarly those falling arrows could not injure any part of the body of that night creature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)