श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 18: रावण द्वारा मरुत्त की पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओं का मयूर आदि पक्षियों को वरदान देना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  7.18.23-24 
इदं नेत्रसहस्रं तु यत् तद् बर्हे भविष्यति।
वर्षमाणे मयि मुदं प्राप्स्यसे प्रीतिलक्षणाम्॥ २३॥
एवमिन्द्रो वरं प्रादान्मयूरस्य सुरेश्वर:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मेरे ये सहस्त्र नेत्र, तुम्हारे पंखों पर भी ऐसे ही चिह्न प्रकट होंगे। जब मैं मेघ रूप में वर्षा करूँगा, तब तुम्हें अत्यन्त प्रसन्नता होगी। वह प्रसन्नता मेरी प्राप्ति का सूचक होगी।’ इस प्रकार देवराज इन्द्र ने मुझे आशीर्वाद दिया॥23-24॥
 
These thousand eyes of mine, similar signs will appear on your wings. When I will rain in the form of a cloud, you will feel very happy. That happiness will indicate my attainment.' In this way, Devraj Indra blessed me.॥ 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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