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ramayan 7.18.1: अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन! वेदवती के अग्नि में प्रवेश करने के बाद रावण पुष्पकविमान पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा॥1॥   |   ramayan सर्ग 7.18: रावण द्वारा मरुत्त की पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओं का मयूर आदि पक्षियों को वरदान देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 18: रावण द्वारा मरुत्त की पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओं का मयूर आदि पक्षियों को वरदान देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.18.1 
प्रविष्टायां हुताशं तु वेदवत्यां स रावण:।
पुष्पकं तु समारुह्य परिचक्राम मेदिनीम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन! वेदवती के अग्नि में प्रवेश करने के बाद रावण पुष्पकविमान पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा॥1॥
 
Agastyaji says – Raghunandan! After Vedvati entered the fire, Ravana, mounted on Pushpakavimana, started traveling all over the earth. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)