श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 17: रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.17.5 
रूपं तेऽनुपमं भीरु कामोन्मादकरं नृणाम्।
न युक्तं तपसि स्थातुं निर्गतो ह्येष निर्णय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भीरु! तुम्हारे सौन्दर्य की कोई तुलना नहीं है। यह मनुष्यों के हृदय में काम-विक्षोभ उत्पन्न करता है। अतः तुम्हारा तप करना उचित नहीं है। तुम्हारे लिए हमारे हृदय से यही निर्णय निकला है ॥5॥
 
Bhiru! There is no comparison to your beauty. It creates lustful madness in the hearts of men. Therefore, it is not right for you to engage in penance. This is the decision that has come from our hearts for you. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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