श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 17: रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  7.17.32-33h 
नहि शक्य: स्त्रिया हन्तुं पुरुष: पापनिश्चय:॥ ३२॥
शापे त्वयि मयोत्सृष्टे तपसश्च व्ययो भवेत्।
 
 
अनुवाद
'स्त्री अपने भुजबल से पापी पुरुष का वध नहीं कर सकती। यदि मैं तुम्हें श्राप दूँगी, तो मेरी तपस्या क्षीण हो जाएगी।'
 
‘A woman cannot kill a sinful man with her physical strength. If I curse you, my penance will be weakened. 32 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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