श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 17: रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.17.21 
अवलिप्तासि सुश्रोणि यस्यास्ते मतिरीदृशी।
वृद्धानां मृगशावाक्षि भ्राजते पुण्यसंचय:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
सुश्रोणि! तुम अहंकारी प्रतीत होती हो, इसीलिए तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गई है। हे मृग-शावक-नेत्र! इस प्रकार पुण्य संचय वृद्ध स्त्रियों को ही शोभा देता है, तुम्हारे समान युवती स्त्रियों को नहीं॥ 21॥
 
‘Sushroni! You seem to be arrogant, that is why your intelligence has become like this. O deer-cub-eyed one! Accumulation of virtues in this manner suits only old women, not young women like you.॥ 21॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas