श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 17: रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.17.16 
ततो मनोरथं सत्यं पितुर्नारायणं प्रति।
करोमीति तमेवाहं हृदयेन समुद्वहे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तब से मैंने भगवान नारायण के प्रति अपने पिता की इच्छा पूर्ण करने का संकल्प लिया है। इसीलिए मैं उन्हें अपने हृदय मंदिर में रखता हूँ॥16॥
 
‘Since then I have vowed to fulfil the wish of my father for Lord Narayana. That is why I keep him in the temple of my heart.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)