श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  7.16.42-43h 
मानुषान् न गणे देव स्वल्पास्ते मम सम्मता:।
दीर्घमायुश्च मे प्राप्तं ब्रह्मणस्त्रिपुरान्तक॥ ४२॥
वाञ्छितं चायुष: शेषं शस्त्रं त्वं च प्रयच्छ मे।
 
 
अनुवाद
‘देव! मैं मनुष्यों को कुछ भी नहीं मानता। मेरी मान्यता के अनुसार उनकी शक्ति बहुत अल्प है। त्रिपुरांतक! मुझे ब्रह्माजी से दीर्घायु भी प्राप्त हुई है। ब्रह्माजी द्वारा दी गई आयु का जो भी भाग शेष है, मैं उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करना चाहता हूँ (किसी भी कारण से वह कम न हो)। यही मेरी इच्छा है। कृपया इसे पूर्ण करें। इसके साथ ही मुझे अपनी ओर से एक अस्त्र भी प्रदान करें।’॥42 1/2॥
 
‘Dev! I do not consider humans as anything. According to my belief, their power is very less. Tripurantaka! I have also received long life from Brahmaji. Whatever portion of the life span given by Brahmaji is remaining, I wish to get it in full (it should not be reduced due to any reason). This is my wish. Please fulfill this. Along with this, give me a weapon from your side too.’॥ 42 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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