श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  7.16.4-5 
विष्टब्धं किमिदं कस्मान्नागमत् कामगं कृतम्।
अचिन्तयद् राक्षसेन्द्र: सचिवैस्तै: समावृत:॥ ४॥
किंनिमित्तमिच्छया मे नेदं गच्छति पुष्पकम्।
पर्वतस्योपरिष्ठस्य कर्मेदं कस्यचिद् भवेत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तब दैत्यराज अपने मन्त्रियों सहित विचार करने लगे—‘यह पुष्पक विमान किस कारण रुक गया है? इसे स्वामी की इच्छानुसार चलने के लिए बनाया गया है। फिर यह आगे क्यों नहीं बढ़ रहा है? यह पुष्पक विमान मेरी इच्छानुसार क्यों नहीं चल रहा है? सम्भव है कि इस पर्वत के ऊपर कोई रहता हो, यह उसी का कर्म हो?’॥4-5॥
 
Then the demon king, along with his ministers, started thinking—'What is the reason that this Pushpak Vimana has stopped? It has been made to move according to the wish of the master. Then why is it not moving forward? What is the reason that this Pushpak Vimana is not moving according to my wish? It is possible that someone lives on top of this mountain, this could be his deed?'॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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