श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  7.16.39 
गच्छ पौलस्त्य विस्रब्धं पथा येन त्वमिच्छसि।
मया चैवाभ्यनुज्ञातो राक्षसाधिप गम्यताम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
पुलस्त्यनन्दन! अब तुम निर्भय होकर जहाँ चाहो जा सकते हो। हे राक्षस! मैं भी तुम्हें अपने मार्ग पर जाने की अनुमति देता हूँ, जाओ।॥39॥
 
‘Pulastyanadanandan! Now you can go whichever way you want without any fear. O demon! I also give you permission to go my way, go.'॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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