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श्लोक 7.16.39  |
गच्छ पौलस्त्य विस्रब्धं पथा येन त्वमिच्छसि।
मया चैवाभ्यनुज्ञातो राक्षसाधिप गम्यताम्॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| पुलस्त्यनन्दन! अब तुम निर्भय होकर जहाँ चाहो जा सकते हो। हे राक्षस! मैं भी तुम्हें अपने मार्ग पर जाने की अनुमति देता हूँ, जाओ।॥39॥ |
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| ‘Pulastyanadanandan! Now you can go whichever way you want without any fear. O demon! I also give you permission to go my way, go.'॥ 39॥ |
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