| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति » श्लोक 36-37 |
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| | | | श्लोक 7.16.36-37  | प्रीतोऽस्मि तव वीरस्य शौटीर्याच्च दशानन।
शैलाक्रान्तेन यो मुक्तस्त्वया राव: सुदारुण:॥ ३६॥
यस्माल्लोकत्रयं चैतद् रावितं भयमागतम्।
तस्मात् त्वं रावणो नाम नाम्ना राजन् भविष्यसि॥ ३७॥ | | | | | | अनुवाद | | 'दशानन! तुम वीर हो। मैं तुम्हारे पराक्रम से प्रसन्न हूँ। पर्वत से कुचले जाने पर तुमने जो भयंकर गर्जना की, उससे तीनों लोकों के प्राणी भयभीत होकर त्राहि-त्राहि करने लगे, इसीलिए हे राक्षसराज! अब तुम रावण के नाम से प्रसिद्ध होगे॥ 36-37॥ | | | | ‘Dashanan! You are brave. I am happy with your bravery. Because of the terrible roar you made due to being crushed by the mountain, the creatures of the three worlds started crying in fear, that is why, O demon king! Now you will be famous by the name of Ravana. 36-37॥ | | ✨ ai-generated | | |
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