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ramayan 7.16.34: मंत्रियों के ऐसा कहने पर दसमुख वाले रावण ने भगवान वृषभध्वज को प्रणाम किया और सामवेद में वर्णित नाना प्रकार के स्तोत्रों और मन्त्रों से उनकी स्तुति की। इस प्रकार उस राक्षस ने अपने हाथों की पीड़ा से रोते और स्तुति करते हुए एक हजार वर्ष व्यतीत कर दिए।   |   ramayan सर्ग 7.16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.16.34 
एवमुक्तस्तदामात्यैस्तुष्टाव वृषभध्वजम्।
सामभिर्विविधै: स्तोत्रै: प्रणम्य स दशानन:।
संवत्सरसहस्रं तु रुदतो रक्षसो गतम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
मंत्रियों के ऐसा कहने पर दसमुख वाले रावण ने भगवान वृषभध्वज को प्रणाम किया और सामवेद में वर्णित नाना प्रकार के स्तोत्रों और मन्त्रों से उनकी स्तुति की। इस प्रकार उस राक्षस ने अपने हाथों की पीड़ा से रोते और स्तुति करते हुए एक हजार वर्ष व्यतीत कर दिए।
 
On being told so by the ministers, the ten-faced Ravana bowed to Lord Vrishabhadhwaj and praised him with various hymns and mantras written in the Samaveda. In this way the demon spent a thousand years crying and praising due to the pain in his hands. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)