श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.16.32 
तोषयस्व महादेवं नीलकण्ठमुमापतिम्।
तमृते शरणं नान्यं पश्यामोऽत्र दशानन॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् दशग्रीव के मंत्रियों ने उनसे कहा - 'महाराज दशानन! अब आप नीलकंठ उमावल्लभ महादेवजी को प्रसन्न कीजिए। उनके अतिरिक्त हमें कोई दूसरा ऐसा नहीं दिखाई देता जो आपको यहाँ शरण दे सके।' 32॥
 
Thereafter Dashagriva's ministers said to him - 'Maharaj Dashanan! Now you please satisfy Neelkanth Umavallabh Mahadevji. Apart from them, we do not see anyone else who can give you shelter here. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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