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श्लोक 7.16.24  |
केन प्रभावेण भवो नित्यं क्रीडति राजवत्।
विज्ञातव्यं न जानीते भयस्थानमुपस्थितम्॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| शंकरजी किस बल से यहाँ प्रतिदिन राजा की भाँति क्रीड़ा करते हैं? उन्हें इस बात का भान ही नहीं कि उनके सामने भय का स्थान विद्यमान है॥24॥ |
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| ‘By what force does Shankara play here every day like a king? He is unaware of the fact that a place of fear is present before him.’॥ 24॥ |
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