श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  7.16.23 
पुष्पकस्य गतिश्छिन्ना यत्कृते मम गच्छत:।
तमिमं शैलमुन्मूलं करोमि तव गोपते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
पाशुपत! जिसके कारण मेरे पुष्पक विमान की गति यात्रा करते समय रुक गयी थी, उसी प्रकार तुम्हारे उस पर्वत को भी जो मेरे सामने खड़ा है, मैं उखाड़ फेंकूँगा।
 
Pashupata! Because of which the speed of my Pushpaka Vimana stopped while travelling, I will uproot that mountain of yours which is standing in front of me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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