श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 16: नन्दीश्वर का रावण को शाप, भगवान् शङ्कर द्वारा रावण का मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास नामक खड्ग की प्राप्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  7.16.20 
किं त्विदानीं मया शक्यं हन्तुं त्वां हे निशाचर।
न हन्तव्यो हतस्त्वं हि पूर्वमेव स्वकर्मभि:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे रात्रि प्राणी! मुझमें अभी तुझे मारने की शक्ति है, परन्तु मुझे तुझे मारना आवश्यक नहीं है, क्योंकि तू अपने पापकर्मों से पहले ही मारा जा चुका है (अतः मरे हुए को मारने से क्या लाभ?)॥20॥
 
O night creature! I have the power to kill you right now, but I don't have to kill you because you have already been killed by your evil deeds (so what is the use of killing a dead person?)'॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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