श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 15: माणिभद्र तथा कुबेर की पराजय और रावण द्वारा पुष्पक विमान का अपहरण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.15.2 
रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम्।
शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे यक्ष! रावण पापी और दुष्ट है। तुम उसका वध करो और युद्ध में चमकने वाले वीर यक्षों को शरण दो - उनकी रक्षा करो।॥2॥
 
O great Yaksha! Ravan is a sinner and a wicked person. You should kill him and give shelter to the valiant Yakshas who shine in battle - protect them.'॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)