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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 15: माणिभद्र तथा कुबेर की पराजय और रावण द्वारा पुष्पक विमान का अपहरण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.15.1 
ततस्ताँल्लक्ष्य वित्रस्तान् यक्षेन्द्रांश्च सहस्रश:।
धनाध्यक्षो महायक्षं माणिभद्रमथाब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
(अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन!) साहूकार ने हजारों यक्षप्रवरों को भयभीत होकर भागते देखा; तब उन्होंने मणिभद्र नामक एक महान देवता से कहा - 1॥
 
(Agastyaji says - Raghunandan!) The moneylenders saw thousands of Yakshapravaras running away in fear; Then he said to a great deity named Manibhadra - 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)