तत: स सचिवै: सार्धं षड्भिर्नित्यबलोद्धत:।
महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणै:॥ १॥
धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगर्द्धिना।
वृत: सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव॥ २॥
अनुवाद
(अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन!) तत्पश्चात, शक्ति के मद में चूर रावण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण तथा सदैव युद्ध की इच्छा रखने वाले वीर धूम्राक्ष - इन छह मंत्रियों के साथ लंका से प्रस्थान कर गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह अपने क्रोध से समस्त जगत का विनाश कर देगा।
(Agastyaji says - Raghunandan!) Thereafter, Ravana, who was always mad with pride of power, left Lanka with six ministers - Mahodar, Prahastha, Marich, Shuka, Saran and the brave Dhumraksh who always had a desire for war. At that time it seemed as if he would destroy the entire world with his anger.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥