श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 14: मन्त्रियों सहित रावण का यक्षों पर आक्रमण और उनकी पराजय  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  7.14.1-2 
तत: स सचिवै: सार्धं षड‍‍्भिर्नित्यबलोद्धत:।
महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणै:॥ १॥
धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगर्द्धिना।
वृत: सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव॥ २॥
 
 
अनुवाद
(अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन!) तत्पश्चात, शक्ति के मद में चूर रावण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण तथा सदैव युद्ध की इच्छा रखने वाले वीर धूम्राक्ष - इन छह मंत्रियों के साथ लंका से प्रस्थान कर गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह अपने क्रोध से समस्त जगत का विनाश कर देगा।
 
(Agastyaji says - Raghunandan!) Thereafter, Ravana, who was always mad with pride of power, left Lanka with six ministers - Mahodar, Prahastha, Marich, Shuka, Saran and the brave Dhumraksh who always had a desire for war. At that time it seemed as if he would destroy the entire world with his anger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)