श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 30-32h
 
 
श्लोक  7.13.30-32h 
देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम्।
पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात्॥ ३०॥
एकाक्षपिङ्गलीत्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम्।
एवं तेन सखित्वं च प्राप्यानुज्ञां च शङ्करात्॥ ३१॥
आगतेन मया चैवं श्रुतस्ते पापनिश्चय:।
 
 
अनुवाद
देवी पार्वती के रूप को देखकर उनके प्रभाव से तुम्हारा बायां नेत्र जल गया तथा दूसरा नेत्र भी लाल हो गया। इस कारण तुम्हारा नाम 'एकाक्ष पिंगली' हो गया जो सदा के लिए अटल हो जाएगा। भगवान शंकर से मित्रता स्थापित करके तथा उनकी अनुमति लेकर जब मैं घर लौटा, तब मैंने तुम्हारे पापमय निश्चय के विषय में सुना।।30-31 1/2।।
 
Your left eye got burnt due to the influence of the Goddess Parvati on seeing her form and the other eye also became red in colour. Due to this, your name 'Ekaaksha Pingali' which will remain constant forever will become permanent.' After establishing friendship with Lord Shankar and taking his permission, when I returned home, then I heard about your sinful determination. 30-31 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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