श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 11: रावण का संदेश सुनकर पिता की आज्ञा से कुबेर का लङ्का को छोड़कर कैलास पर जाना, लङ्का में रावण का राज्याभिषेक तथा राक्षसों का निवास  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.11.4 
दिष्टॺा ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितोऽयं मनोरथ:।
यस्त्वं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान् वरमुत्तमम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
बेटा! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हें तीनों लोकों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी से महान वरदान प्राप्त हुआ है, जिसके कारण तुम्हारी यह चिरकालीन अभिलाषा पूरी हो गई है।
 
Son! It is a matter of great fortune that you have received a great boon from the greatest of the three worlds, Brahmaji, due to which this long-cherished desire of yours has been fulfilled.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)