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ramayan 7.108.33-34h: हरिश्वर! जब तक संसार में मेरी कथाएँ फैली रहें, तब तक तुम भी मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करते रहो।’ ॥33 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.108: श्रीरामचन्द्रजी का भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछों के साथ परमधाम जाने का निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविद को इस भूतल पर ही रहने का आदेश देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 108: श्रीरामचन्द्रजी का भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछों के साथ परमधाम जाने का निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविद को इस भूतल पर ही रहने का आदेश देना  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  7.108.33-34h 
मत्कथा: प्रचरिष्यन्ति यावल्लोके हरीश्वर॥ ३३॥
तावद् रमस्व सुप्रीतो मद्वाक्यमनुपालयन्।
 
 
अनुवाद
हरिश्वर! जब तक संसार में मेरी कथाएँ फैली रहें, तब तक तुम भी मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सुखपूर्वक विचरण करते रहो।’ ॥33 1/2॥
 
Harishwar! As long as my stories are spread in the world, you too should continue to wander around happily obeying my orders.' ॥ 33 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)