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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 108: श्रीरामचन्द्रजी का भाइयों, सुग्रीव आदि वानरों तथा रीछों के साथ परमधाम जाने का निश्चय और विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मैन्द एवं द्विविद को इस भूतल पर ही रहने का आदेश देना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  7.108.30-31h 
किंचान्यद् वक्तुमिच्छामि राक्षसेन्द्र महाबल।
आराधय जगन्नाथमिक्ष्वाकुकुलदैवतम्॥ ३०॥
आराधनीयमनिशं देवैरपि सवासवै:।
 
 
अनुवाद
हे महाबली दैत्यराज! इसके अतिरिक्त मैं आपसे एक और बात कहना चाहता हूँ। हमारे इक्ष्वाकु कुल के देवता भगवान जगन्नाथ (श्रीशेष अवस्था में स्थित भगवान विष्णु) हैं। इन्द्र आदि देवता भी उनकी निरन्तर पूजा करते रहते हैं। आप भी सदैव उनकी पूजा करते रहें।॥30 1/2॥
 
‘O mighty demon king! Apart from this I want to tell you one more thing. The deity of our Ikshwaku clan is Lord Jagannath (Lord Vishnu who is in the state of Shrishesha). Even gods like Indra keep worshipping him continuously. You too should always keep worshipping him.'॥ 30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)