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ramayan 7.105.18: तत्पश्चात् काल के वचनों पर विचार करके महायशस्वी श्री रघुनाथजी इस निर्णय पर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ नहीं होगा।’ ऐसा सोचकर वे मौन रहे॥18॥   |   ramayan सर्ग 7.105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.105.18 
ततो बुद्धॺा विनिश्चित्य कालवाक्यानि राघव:।
नैतदस्तीति निश्चित्य तूष्णीमासीन्महायशा:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् काल के वचनों पर विचार करके महायशस्वी श्री रघुनाथजी इस निर्णय पर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ नहीं होगा।’ ऐसा सोचकर वे मौन रहे॥18॥
 
After that, after thoughtfully pondering over the words of Kaal, Mahayashasvi Shri Raghunathji came to the decision that 'Now all this will be nothing.' Thinking like this, he remained silent. 18॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चाधिकशततम: सर्ग: ॥ १ ०५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ०५॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)