श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.105.17 
दु:खेन च सुसंतप्त: स्मृत्वा तद‍्घोरदर्शनम्।
अवाङ्मुखो दीनमना व्याहर्तुं न शशाक ह॥ १७॥
 
 
अनुवाद
काल के वचनों को, जिनसे भावी भाइयों के वियोग का भयंकर दृश्य मन में आ गया था, सोचकर श्री रामजी अत्यन्त दुःखी हुए, उनका मुख झुक गया और वे कुछ भी न बोल सके॥17॥
 
Thinking about the words of Kaal which brought to his mind the dreadful scene of future separation of brothers, Shri Ram felt very sad. His face bowed down and he could not say anything.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)