श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.105.13 
अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिर्मम राघव।
सोऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे भोले रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्ष तक व्रत किया था। आज मेरे व्रत का समापन है, अतः इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन बनेगा, मैं उसे खाना चाहता हूँ।॥13॥
 
Innocent Raghunandan! I fasted for a thousand years. Today is the end of my fast, so I want to eat whatever food is prepared at your place at this time.'॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)