श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.105.1 
तथा तयो: संवदतोर्दुर्वासा भगवानृषि:।
रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राजद्वारमुपागमत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
जब वे दोनों आपस में बातचीत कर रहे थे, तभी महर्षि दुर्वासा राजद्वार पर आये और श्री रामचन्द्रजी से मिलना चाहते थे॥1॥
 
While these two were conversing, Maharishi Durvasa arrived at the royal gate. He wanted to meet Shri Ramchandraji. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)