Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 7.104.19: हे काल! मैंने मन ही मन तुम्हारा चिन्तन किया था। उसी के अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषय में मेरा कोई विचार नहीं है। हे सर्वनाशी काल! पितामह ने जैसा कहा है, वैसा ही मुझे अपने समस्त कार्यों में सदैव देवताओं के अधीन रहना चाहिए।॥19॥ | ramayan सर्ग 7.104: कालका श्रीरामचन्द्रजी को ब्रह्माजी का संदेश सुनाना और श्रीराम का उसे स्वीकार करना । ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
हृद्गतो ह्यसि सम्प्राप्तो न मे तत्र विचारणा।
मया हि सर्वकृत्येषु देवानां वशवर्तिना।
स्थातव्यं सर्वसंहार यथा ह्याह पितामह:॥ १९॥
अनुवाद
हे काल! मैंने मन ही मन तुम्हारा चिन्तन किया था। उसी के अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषय में मेरा कोई विचार नहीं है। हे सर्वनाशी काल! पितामह ने जैसा कहा है, वैसा ही मुझे अपने समस्त कार्यों में सदैव देवताओं के अधीन रहना चाहिए।॥19॥
Kaal! I had thought of you in my mind. According to that you have come here; therefore I have no thoughts about this matter. O all-destroying Kaal! I should always remain under the control of the gods in all my tasks, as the grandfather has said.'॥ 19॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुरधिकशततम: सर्ग: ॥ १ ०४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ०४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥