इस प्रकार वचन सुनकर लक्ष्मणजी को द्वार पर खड़ा करके श्री रघुनाथजी ने वहाँ उपस्थित मुनि से कहा, "मुनि! अब आप जो कुछ कहना चाहते हैं या जो कहने के लिए आपको यहाँ भेजा गया है, उसे निःसंदेह कहिए। मेरा हृदय भी उसे सुनने के लिए उत्सुक है।" ॥16-17॥
Having stationed Lakshmana, who had thus received his words, at the door, Shri Raghunatha said to the assembled sage, "Muni! Now you must say without any doubt what you wish to say or what you have been sent here to say. My heart too is eager to hear it." ॥16-17॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्र्यधिकशततम: सर्ग:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ०३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)