सर्ग 102: श्रीराम की आज्ञा से भरत और लक्ष्मण द्वारा कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतु की कारुपथ देश के विभिन्न राज्यों पर नियुक्ति
श्लोक 1: भरत से गन्धर्वदेश का समाचार सुनकर श्री रामचन्द्रजी अपने भाइयों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् श्री राघवेन्द्र ने अपने भाइयों से ये अद्भुत वचन कहे- 1॥
श्लोक 2: सुमित्रानन्दन! आपके ये दोनों पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु धर्म में निपुण हैं। इनमें राज्य की रक्षा के लिए उपयुक्त दृढ़ संकल्प और पराक्रम है।
श्लोक 3: अतः मैं उन्हें राजा बनाऊँगा। तुम उनके लिए एक उत्तम देश चुनो, जो सुन्दर होने के साथ-साथ निर्विघ्न भी हो और जहाँ ये दोनों धनुर्धर सुखपूर्वक रह सकें॥3॥
श्लोक 4: सौम्य! ऐसे देश की खोज करो, जहाँ अन्य राजाओं को रहने से कष्ट या कष्ट न उठाना पड़े, जहाँ आश्रमों का नाश न करना पड़े और हमें किसी की दृष्टि में अपराधी न बनना पड़े।’ ॥4॥
श्लोक 5: श्री रामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर भरत ने उत्तर दिया - 'आर्य! यह कारूपथ नामक देश अत्यंत सुन्दर है। वहाँ किसी भी प्रकार के रोग का भय नहीं है।॥5॥
श्लोक 6: ‘वहाँ महात्मा अंगद के लिए एक नई राजधानी स्थापित की जाए और चन्द्रकेतु (या चन्द्रकान्त) के रहने के लिए ‘चन्द्रकान्त’ नामक एक नगर बसाया जाए, जो सुन्दर और स्वस्थ हो।’॥6॥
श्लोक 7: श्री रघुनाथजी ने भरत की बात मान ली और कारुपथ देश पर अधिकार कर लिया तथा अंगद को उसका राजा बना दिया।
श्लोक 8: बिना किसी कष्ट के कर्म करने वाले भगवान राम ने अंगद के लिए 'अंगदीय' नामक एक सुन्दर नगर बसाया, जो न केवल अत्यंत सुन्दर था, अपितु सब ओर से सुरक्षित भी था।
श्लोक 9: चन्द्रकेतु शरीर से पहलवान के समान बलवान था; उसके लिए मल्ल देश में 'चन्द्रकान्ता' नाम से एक दिव्य नगरी बनवाई गई, जो अमरावती नामक स्वर्गीय नगरी के समान सुन्दर थी॥9॥
श्लोक 10: इससे श्रीराम, लक्ष्मण और भरत बहुत प्रसन्न हुए और उन सभी वीर योद्धाओं ने स्वयं उन राजकुमारों का अभिषेक किया।
श्लोक 11: उन दोनों एकाग्र और सतर्क कुमारों का अभिषेक करके अंगद को पश्चिम दिशा में और चन्द्रकेतु को उत्तर दिशा में भेजा गया ॥11॥
श्लोक 12: सुमित्राकुमार लक्ष्मण स्वयं अंगद के साथ गए और चन्द्रकेतु के सहायक भरतजी थे।
श्लोक 13: लक्ष्मण एक वर्ष तक अंगदीय पुरी में रहे और जब उनके भयंकर पुत्र अंगद दृढ़तापूर्वक राज्य करने लगे, तब वे पुनः अयोध्या लौट आए॥ 13॥
श्लोक 14: इसी प्रकार भरत भी चन्द्रकान्ता नगरी में एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक रहे और जब चन्द्रकेतु का राज्य सुदृढ़ हो गया, तब वे पुनः अयोध्या आकर श्री रामजी के चरणों की सेवा करने लगे॥ 14॥
श्लोक 15: लक्ष्मण और भरत दोनों को श्री रामचन्द्रजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम था। वे दोनों अत्यन्त धर्मात्मा थे। उन्होंने श्री रामजी की सेवा में बहुत समय बिताया, परन्तु अत्यधिक स्नेह के कारण उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया॥15॥
श्लोक 16: वे तीनों भाई नगर के लोगों के काम में लगे रहते थे और धर्मपालन के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। इस प्रकार उन्हें दस हजार वर्ष बीत गए॥16॥
श्लोक 17: वे तीनों भाई धर्म-साधना के स्थल अयोध्यापुरी में ऐश्वर्यपूर्वक रहते हुए समय-समय पर भ्रमण करते और प्रजा का पालन करते थे। उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती थीं और वे महायज्ञ में आहुति पाकर प्रज्वलित होने वाली गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणा नामक त्रिविध अग्नियों के समान प्रकाशित होते थे। 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥