श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 100: केकयदेश से ब्रह्मर्षि गार्ग्य का भेंट लेकर आना और उनके संदेश के अनुसार श्रीराम की आज्ञा से कुमारों सहित भरत का गन्धर्व देश पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  7.100.4-5 
श्रुत्वा तु राघवो धीमान् महर्षिं गार्ग्यमागतम्।
मातुलस्याश्वपतिन: प्रहितं तन्महाधनम्॥ ४॥
प्रत्युद‍्गम्य च काकुत्स्थ: क्रोशमात्रं सहानुज:।
गार्ग्यं सम्पूजयामास यथा शक्रो बृहस्पतिम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब परम बुद्धिमान श्रीमान् राघवेन्द्र ने सुना कि उनके मामा अश्वपति के पुत्र युधाजित् द्वारा भेजे हुए महामुनि गार्ग्य बहुमूल्य उपहार लेकर अयोध्या आ रहे हैं, तब वे अपने भाइयों के साथ उनका स्वागत करने के लिए एक कोस आगे गए और जैसे इन्द्र बृहस्पति का पूजन करते हैं, उसी प्रकार महामुनि गार्ग्य का पूजन (स्वागत) किया॥ 4-5॥
 
When the extremely intelligent Shriman Raghavendra heard that the great sage Gargya, sent by his maternal uncle Ashwapati's son Yudhajit, was arriving in Ayodhya with precious gifts, he along with his brothers went a kos ahead to receive him and worshipped (welcomed) the great sage Gargya in the same manner as Indra worships Brihaspati.॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)