श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 100: केकयदेश से ब्रह्मर्षि गार्ग्य का भेंट लेकर आना और उनके संदेश के अनुसार श्रीराम की आज्ञा से कुमारों सहित भरत का गन्धर्व देश पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  7.100.15-16 
सोऽब्रवीद् राघव: प्रीत: साञ्जलिप्रग्रहो द्विजम्।
इमौ कुमारौ तं देशं ब्रह्मर्षे विचरिष्यत:॥ १५॥
भरतस्यात्मजौ वीरौ तक्ष: पुष्कल एव च।
मातुलेन सुगुप्तौ तु धर्मेण सुसमाहितौ॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् श्री राघवेन्द्र ने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर उन ब्रह्मर्षि से कहा - 'ब्रह्मर्षि! ये दोनों पुत्र तक्षक और पुष्कल, जो भरत के वीर पुत्र हैं, उस देश में विचरण करेंगे और अपने मामाओं से सुरक्षित रहकर एकाग्रचित्त होकर उस देश का शासन करेंगे ॥15-16॥
 
Thereafter, Shri Raghavendra happily folded his hands and said to that Brahmarshi – ‘Brahmarshi! These two sons, Taksha and Pushkala, who are the brave sons of Bharata, will roam in that country and will rule that country with a focused mind, remaining safe from their maternal uncles. 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)