श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 100: केकयदेश से ब्रह्मर्षि गार्ग्य का भेंट लेकर आना और उनके संदेश के अनुसार श्रीराम की आज्ञा से कुमारों सहित भरत का गन्धर्व देश पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  7.100.12-13 
तान् विनिर्जित्य काकुत्स्थ गन्धर्वनगरं शुभम्॥ १२॥
निवेशय महाबाहो स्वे पुरे सुसमाहिते।
अन्यस्य न गतिस्तत्र देश: परमशोभन:।
रोचतां ते महाबाहो नाहं त्वामहितं वदे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘ककुत्स्थ! महाबाहो! उन गंधर्वों को परास्त करके तुम वहाँ एक सुन्दर गंधर्वनगर बसाओ। अपने लिए उत्तम सुविधाओं से युक्त दो नगर बनाओ। वह देश अत्यन्त सुन्दर है। वहाँ कोई और नहीं जा सकता। तुम उसे अपने अधीन करना स्वीकार करो। मैं तुम्हें कोई ऐसी सलाह नहीं दे रहा हूँ जो तुम्हारे लिए हानिकारक हो।’॥12-13॥
 
‘Kakutstha! Mahabaho! After defeating those Gandharvas, you should establish a beautiful Gandharvanagar there. Build two cities for yourself, equipped with the best facilities. That country is very beautiful. No one else can go there. You should accept to take it under your control. I am not giving you any advice that would be harmful.’॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)