श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  7.10.44-45 
कुम्भकर्णस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वचनमब्रवीत्॥ ४४॥
स्वप्तुं वर्षाण्यनेकानि देवदेव ममेप्सितम्।
एवमस्त्विति तं चोक्त्वा प्रायाद् ब्रह्मा सुरै:समम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर कुम्भकर्ण ने कहा, ‘हे देव! मैं अनेक वर्षों तक सोना चाहता हूँ।’ तब ‘ऐसा ही हो’ कहकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ चले गए।
 
Hearing this, Kumbhakarna said, 'O God! I wish to sleep for many years.' Then saying 'So be it', Brahmaji left with the gods.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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