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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  7.10.42-43h 
प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरस्वतीम्॥ ४२॥
वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव वाग्देवतेप्सिता।
 
 
अनुवाद
तब प्रजापति ने वहाँ आयी हुई सरस्वती देवी से कहा - 'वाणी! आप दैत्यराज कुम्भकर्ण की जिह्वा पर विद्यमान हैं और देवताओं के अनुकूल वाणी के रूप में प्रकट होती हैं।
 
Then Prajapati said to Saraswati Devi who had come there - 'Vani! You are present on the tongue of demon king Kumbhakarna and appear in the form of speech favorable to the gods.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)